Tuesday, September 27, 2011

भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह प्रणाली (आईआरएस)


भारतीय सुदूर संवेदन (आईआरएस) उपग्रह प्रणाली आज दुनिया में प्रचालित सुदूर संवेदन उपग्रहों के सबसे बड़े समूहों में से एक है। 1988 में आईआरएस-1ए के प्रमोचन के साथ आईआरएस कार्यक्रम प्रवर्तित हुआ और आज इसमें दस उपग्रह शामिल हैं जिनके द्वारा एक मीटर से बेहतर 500 मीटर तक के विस्तार सहित विविध स्थानिक विभेदनों में प्रतिबिंबिकी उपलब्ध कराना जारी है।

1.
पीएसएलवी-16 द्वारा 20 अप्रैल, 2011 को प्रमोचित
2.
पीएसएलवी-सी15 द्वारा 12 जुलाई, 2010 को प्रमोचित
3.
पीएसएलवी-सी14 द्वारा 23 सितंबर, 2009 को प्रमोचित
4.
पीएसएलवी-सी12 द्वारा 20 अप्रैल, 2009 को प्रमोचित
5.
पीएसएलवी-सी9 द्वारा 28 अप्रैल, 2008 को प्रमोचित
6.
पीएसएलवी-सी9 द्वारा 28 अप्रैल, 2008 को प्रमोचित
7.
पीएसएलवी-सी7 द्वारा 10 जनवरी, 2007 को प्रमोचित
8.
पीएसएलवी-सी6 द्वारा 5 मई, 2005 को प्रमोचित
9.
पीएसएलवी-सी5 द्वारा 17 अक्तूबर, 2003 को प्रमोचित
10.
पीएसएलवी-सी3 द्वारा 22 अक्तूबर, 2001 को प्रमोचित



आईआरएस के उपयोग

भारतीय सुदूर संवेदन (आईआरएस) उपग्रह प्रणाली द्वारा लिए गए प्रतिबिंब का कृषि से लेकर शहरी आयोजना तक विविध क्षेत्रों में उपयोग हो पाया है। कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में फसल स्वास्थ्य का मानीटरन,फसल उत्पाद अनुमान और सूखे का निर्धारण उपयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। प्रासंगिक सुगमता के साथ विभिन्न पैमानों पर मृदा मानचित्रण एक वास्तविकता सिद्ध हुई है।

आईआरएस आँकड़ा का उपयोग भूजल संभाव्य प्रदेश का मानचित्रण और खनिज लक्ष्यांकित कार्यों के लिए भी किया जाता है। आईआरएस आँकड़ा के समुद्री उपयोगों में शामिल हैं संभाव्य मात्स्यिकी प्रदेशों की पहचान और तटीय प्रदेश का मानचित्रण।

वन आवरण मानचित्रण, जैवविविधता विशिष्टीकरण और अब आईआरएस प्रतिबिंबन का उपयोग करते हुए दावानल का मॉनिटरन किया जाता है। आईआरएस अंतरिक्ष-यान बाढ़ और भूकंप क्षति मूल्यांकन का सामयिक इनपुट उपलब्ध कराते हुए, एतद्द्वारा आपदा प्रबंधन के लिए आवश्यक समर्थक बल प्रदान करता है। पुरातात्विक सर्वेक्षण के क्षेत्र में भी, आईआरएस प्रतिबिंबन की उपयोगिता सुस्थापित हो चुकी है।

भू-आधारित सामाजिक-आर्थिक आँकड़ों के साथ अंतरिक्ष आधारित प्रतिबिंबन से उपलब्ध जानकारी का विवेकपूर्ण संयोजन संसाधन मॉनिटरन और उसके प्रबंधन के लिए पूर्णतावादी अभिगम की ओर बढ़ रहा है।

सुदूर संवेदन ने कृषि, वानिकी, भूविज्ञान, जल, समुद्र आदि जैसे विभिन्न संसाधनों का मानचित्रण, अध्ययन, मॉनीटरन और प्रबंधन सक्षम किया है। इसके अलावा इसने पर्यावरण का मॉनीटरन सक्षम किया है और एतद्द्वारा संरक्षण में मदद की है। पिछले चार दशकों में यह पृथ्वी के लगभग हर पहलू पर सूचना संग्रहण का प्रमुख साधन बन गया है। हाल के वर्षों में अति उच्च स्थानिक विभेदन उपग्रहों की उपलब्धता से, उपयोग कई गुणा बढ़ गया है। भारत में सुदूर संवेदन को पिछले चार दशकों के दौरान विभिन्न उपयोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है और उसने विकास में विशेष योगदान दिया है।

भारत के पास भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह (आईआरएस) श्रृंखला - रिसोर्ससैट, कार्टोसैट, ओशनसैट आदि जैसे स्वयं के उपग्रह हैं, जो विभिन्न परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए अपेक्षित आँकड़े उपलब्ध कराते हैं। देश में कार्यान्वित प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं पेय जल अभियान के तहत भू-जल पूर्वेक्षण मानचित्रण, अंतरिक्ष, कृषि-मौसम और भूमि आधारित प्रेक्षण (फसल) का उपयोग करते हुए कृषि उत्पाद का पूर्वानुमान, वन आच्छादन/प्रकार मानचित्रण, घासस्थल मानचित्रण, जैव-विविधता विशिष्टिकरण, हिम और हिमनद अध्ययन, भूमि उपयोग/आवरण मानचित्रण, तटवर्ती अध्ययन, प्रवाल और कच्छ वनस्पति अध्ययन, बंजरभूमि मानचित्रण आदि। असंख्य परियोजनाओं द्वारा जनित सूचना का उपयोग विकास योजना, मॉनिटरन, संरक्षण आदि जैसे अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न विभागों, उद्योगों और अन्य द्वारा किया गया है।

देश में उपग्रह सुदूर संवेदन आँकड़ों का उपयोग करने वाली प्रमुख उपयोग गतिविधियों में शामिल हैं:
  • भूजल पूर्वेक्षण और रीचार्ज क्षेत्र मानचित्रण 
  • राष्ट्रीय बंजरभूमि मॉनीटरन 
  • राष्ट्रीय आर्द्रभूमि सूचीकरण और आकलन 
  • हिम और हिमनदों का अध्ययन 
  • तटवर्ती क्षेत्रों का अध्ययन 
  • अंतरिक्ष, कृषि-मौसमविज्ञानीय और भू आधारित प्रेक्षणों के उपयोग द्वारा कृषि उत्पाद का पूर्वानुमान (फसल) 
  • त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) के अधीन सिंचाई की संभाव्यता का आकलन 
  • राष्ट्रीय कृषि सूखा आकलन और मॉनिटरन प्रणाली 
  • जैव-विविधता विशिष्टीकरण 
  • राष्ट्रीय शहरी सूचना प्रणाली (एनयूआईएस) 
  • भारतीय दावानल अनुक्रिया और निर्धारण प्रणाली (आईएनएफ़एफ़आरएएस) 
  • जल संसाधन सूचना प्रणाली (डब्ल्यूआरआईएस) 
  • विकेंद्रित योजना के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना प्रणाली (एसआईएस-डीपी) 
  • प्राकृतिक संसाधन संगणना (एनआरसी) 
  • बाढ़ मानचित्रण और निगरानी 
  • जल-संग्रहण क्षेत्र निगरानी और विकास 
  • संभाव्य मत्स्य-क्षेत्र (पीएफ़ज़ेड) पूर्वानुमान