Wednesday, September 28, 2011

जीसैट-8



जीसैट-8 

प्रमोचन दिनांक : 20.04.2011 


जीसैट-8, भारत का उन्नत संचार उपग्रह एक उच्च शक्तिवाला उपग्रह है, जिसे इन्सैट प्रणाली में लगाई जा रही है। उत्थापन के दौरान लगभग 3100 किग्रा भारवाले जीसैट-8 उपग्रह को के यू बैण्ड में 24 उच्च शक्ति वाले प्रेषानुकरों तथा एल 1 तथा एल 5 बैण्ड में प्रचालित दो-चैनल वाले जीपीएस आधारित जीईओ संवर्धित नौवहन (गगन) नीतभार का वहन करने के लिए संरूपित किया गया है।
24 के यू बैण्ड प्रेषानुकर इन्सैट प्रणाली की क्षमता को संवर्धित करेगा। गगन नीतभार, उपग्रह आधारित संवर्धन प्रणाली (एसबीएएस), को प्रदान करता है, जिसके जरिए भू आधारित अभिग्राहियों के नेटवर्क द्वारा जीपीएस उपग्रहों से प्राप्त स्थिति की सूचना की यथार्थता, को सुधारा जाता है तथा भूस्थिर उपग्रहों के जरिए देश में प्रयोक्ताओं को उपलब्ध कराया जाता है ।

  
मिशन
संचार
भार
3093 कि.ग्रा (उत्थापन के समय भार) 
1426
कि.ग्रा (शुष्क भार)
पावर
6242 वॉट तथा तीन 100 एएच लिथियम आयन बैटरियाँ प्रदान करते सौर व्यूह
भौतिक आयाम
2.0 x 1.77 x 3.1 मीटर घनाभ
नोदन
कक्षा संवर्धन के लिए, ऑक्सीकारक के रूप में इपधन के रूप में मेनो मिथाईल हाइड्रीजीन (एमएमएच) सहित 440 न्यूटन द्रव अपभू मोटर (एलएएम), तथा नाइट्रोजन के मिश्रित ऑक्सीडाईस (एमओएन-3)
स्थिरीकरण
भू संवेदक, सूर्य संवेदक, संवेग तथा प्रतिक्रिया चक्र, चुम्बक बल आधूर्णित्र तथा आठ 10 न्यूटॉन तथा आठ 22 न्यूटॉन द्विनोदन प्रणोद का प्रयोग करते हुए कक्षा में त्रि-अक्षीय पिंड का स्थिरीकरण
एटेना
के यू बैण्ड के लिए ऑफसेट-फेड फीड प्रदीप्ति सहित दो स्वदेशी रूप से विकसित 2.2 मीटर व्यास वाले प्रेषी/अभिग्रहण ुवीकरण संवेदनशील ग्रिड आकार के बीम प्रस्तरणीकरणीय परावर्तक, गगन के लिए 0.6 मीटर सी-बैंण्ड तथा 0.8x0.8 वर्ग मीटर एल-बैण्ड हेलिक्स एटेना
प्रमोचन दिनांक
मई 21, 2011
प्रमोचन स्थल
कौरू, फ्रेन्च गियाना
प्रमोचन वाहन
एरियाने-5 वी-202
कक्षा
भूतुल्यकाली (55 डिग्री पूर्व)
मिशन कालावधि
12 वर्ष से अधिक

रिसोर्ससैट-2




रिसोर्ससैट-2 

प्रमोचन दिनांक : 20.04.2011



रिसोर्ससैट-2, रिसोर्ससैट-1 का अनुवर्ती उपग्रह है और इसरो द्वारा निर्मित अठारहवाँ उपग्रह है । रिसोर्ससैट-2 का उद्देश्य पूरे विश्व के प्रयोक्ताओं को रिसोर्ससैट-1 द्वारा प्रदत्त सुदूर संवेदन आँकड़ा सेवाओं को जारी रखना है और संवर्धित बहु स्पेक्ट्रमी और स्थानिक आवरण के साथ भी आँकड़ा प्रदान करना है। 

रिसोर्ससैट-1 की तुलना में रिसोर्ससैट-2 में किये गये महत्वपूर्ण परिवर्तन इस प्रकार हैं : लिस-4 बहुस्पेक्ट्रमी प्रमार्ज का 23 कि.मी से 70 कि.मी तक संवर्धन और लिस-3 और लिस-4 में रेडियोमिति यथार्थता का 7 बिट से 10 बिट तक सुधार तथा एवाइफस में 10 बिट से 12 बिट तक सुधार। इनके अलावा, रिसोर्ससैट-2 में नीतभार इलेक्ट्रानिकियों में लघुकरण सहित उपयुक्त परिवर्तन किये गये हैं। 

रिसोर्ससैट-2, जहाजों की अवस्थिति, गति और अन्य सूचना प्राप्त करने के लिए वी एच एफ बैण्ड में जहाजों की निगरानी के लिए परीक्षणात्मक नीतभार के रूप में कोमडेव, कनाडा से प्राप्त ए आई एस (स्वचालित निर्दिष्टीकरण प्रणाली) नामक एक अतिरिक्त नीतभार का भी वहन करता है। 

रिसोर्ससैट-2 अपने कैमरों द्वारा लिये गये प्रतिबिंबों के भण्डार के लिए, जिन्हें बाद में भू केन्द्रों को भेजा जा सकता है, प्रत्येक 200 गीगा बाइट की क्षमतावाले दो ठोस स्थिति रिकार्डरों का वहन करता है। 

मिशन
सुदूर संवेदन
कक्षा
वृत्तीय धृवीय सूर्य तुल्यकाली
अंतःक्षेपण के समय कक्षा की तुंगता
822+ 20 कि.मी. (3 सिग्मा)
कक्षा आनति
98.731 डिग्री + 0.2 डिग्री
उत्थापन भार
1206 कि.ग्रा
कक्षीय अवधि
101.35 मि
प्रतिदिन परिक्रमाओं की संख्या
14
भू मध्य रेखा पार करने का स्थानीय समय
सुबह 10.30 बजे
पुनरागमन
24 दिन
अभिवृत्ति और कक्षा नियंत्रण
प्रतिक्रिया चक्र, चुम्बकीय आघूर्णकों हाइड्राजीन थ्रस्टरों का उपयोग करते हुए 3-अक्षीय स्थिरीकृत पिण्ड
पावर
कालावधि के अंत में 1250 वा. जनन करनेवाला सौर व्यूह, दो 24 एएच निकल-कैडमीयम बैटरियाँ
प्रमोचन दिनांक
अप्रैल 20, 2011
प्रमोचन स्थल
शार केन्द्र, श्रीहरिकोटा भारत
प्रमोचन राकेट
पी.एस.एल.वी-सी16
मिशन कालावधि
5 वर्ष


यूथसैट


यूथसैट 

प्रमोचन दिनांक : 20.04.2011

यूथसैट, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विश्वविद्यालयों और अनुसंधान विद्यार्थियों की भागीदारी के साथ तारकीय और वायुमण्डलीय अध्ययनार्थ एक संयुक्त भारत-रूसी उपग्रह है। 92 कि.ग्रा. के उत्थापन भार के साथ यूथसैट एक लघु उपग्रह है और भारतीय लघु उपग्रह (आई.एम.एस.) श्रृंखला में दूसरा है । सौर परिवर्तनशीलता और तापमण्डल-आयनमण्डल परिवर्तनों के बीच के संबंध का पता लगाना, यूथसैट मिशन का उद्देश्य है। यह उपग्रह तीन नीतभारों का वहन करता है, जिनमें से दो भारत के और एक रूस का हैं। एकसाथ वे पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल के सम्मिश्र, ऊर्जा और गतिकी के अन्वेषण के लिए एक अद्वितीय और विस्तृत परीक्षण पैकेज गठित करते हैं।
इसके भारतीय नीतभार इस प्रकार हैं
1.    आर ए बी आई टी (आयनमण्डलीय-टोमोग्राफी हेतु रेडियो बीकन) आयनमण्डल के समग्र इलेक्ट्रॉन मात्रा (टीईसी) के मानचित्रण के लिए ।
2.    एल आई वी एच वाई एस आई (दलन -फलक की ओर देखनेवाला अति स्पेक्ट्रमी प्रतिबिंबित्र) 450-950 मि.मी. में पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल (80 से 600 कि.मी.) की वायुदीप्ति का मापन करने के लिए ।
रूसी नीतभारः

एस ओ एल आर ए डी - एक्स और गामा किरण फ्लक्स सौर संस्फुट के कालिक और स्पेक्ट्रमी प्राचलों के साथ-साथ पृथ्वी के ध्रुवीय कैप क्षेत्रों में प्रभार कणों के अध्ययन के लिए ।

उत्थापन भार
92 कि.ग्रा
कक्षीय अवधि
101.35 मि.
आयाम
1020 (अक्षनमन)x604 (लोटन) x1340 (पार्श्ववर्तन) एमएम3
अभिवृत्ति और कक्षा नियंत्रण
सूर्य और तारा संवेदकों का उपयोग करनेवाला 3-अक्षीय स्थिरीकृत पिण्ड, लघुकृत चुम्बकत्वमापी, लघुकृत जाइरो, सूक्ष्म प्रतिक्रिया चक्र और चुम्बकीय आघूर्णक
पावर
230 वा. जनन करनेवाला सौर व्यूह, एक 10. 5 ए एच लीथियम-आयन बैटरी
यंत्रवाली
पैराफिन प्रवर्तक आधारित सौर पैनल नियंत्रण और विमोचन यंत्रवाली
प्रमोचन दिनांक
अप्रैल 20, 2011
प्रमोचन स्थल
शार केन्द्र श्रीहरिकोटा भारत
प्रमोचक राकेट
पी.एस.एल.वी.-सी16
कक्षा
वृत्तीय ध्रुवीय सूर्य तुल्यकाली
अंतःक्षेपण पर कक्षा तुंगता
822+20 कि.मी. (3 सिग्मा)
कक्षा आनति
98.731 डिग्री + 0.2 डिग्री
मिशन कालावधि
2 वर्ष


2011 में अंतरिक्ष में प्रक्षेपित उपग्रह


2011 में अंतरिक्ष में प्रक्षेपित उपग्रह

उपग्रह
प्रमोचन दिनांक
प्रमोचन यान
उपग्रह के प्रकार
जीसैट-12
15.07.2011
पीएसएलवी-सी17
भू-स्थिर उपग्रह
जीसैट-8
21.05.2011
एरियाने-5 वीए-202
भू-स्थिर उपग्रह
रिसोर्ससैट-2
20.04.2011
पीएसएलवी-सी16
भू-प्रेक्षण उपग्रह
यूथसैट
20.04.2011
पीएसएलवी-सी16
प्रायोगिक / लघु उपग्रह

भुवन



भुवन 


भुवन एक पारस्परिक बहुमुखी चित्र-कल्प प्रणाली है जो कि उपयोगकर्ता को भुवन ग्लोब में नेविगेट( या उड़ान 'fly ') करने की , उपग्रह द्वारा लिए गए प्रतिबिम्ब को देखने की, उन् प्रतिबिम्बों पर प्राकृतिक संसाधनों, सड़क, भौगोलिक विशेषता, विशिष्ट बिंदु की जानकारी आदि देखने की सुविधा देता है. उपयोगकर्ता इसमें अपने खुद के दिलचस्पी के बिंदु (पीओआई) जोड़ सकते हैं और दूसरों के साथ उसे साझा भी कर सकते हैं. वे दूरी की गणना, क्षेत्र मापन , अपने प्रतिबिम्बों का भुवन पर आच्छादन, आदि कर सकते है. इंटरनेट के साथ जुड़ते ही, आप भुवन पर विशिष्ट स्थानों से सम्बंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. 

उपयोगकर्ता किसी भी परत को छुपा या दिखा सकता है . भुवन पर मापन एवं विभिन्न विश्लेषण उपकरणों के द्वारा उपयोगकर्ता क्षेत्र मापन, दूरी मापन आदि कर सकते हैं, और इसको त्रिआयामी भुवन में भी देख सकते हैं. वे अपने दिलचस्पी के बिंदु (पीओआई) भुवन पर बनाकर उन्हें अन्य वेबसाइट से लिंक भी कर सकते हैं जिससे वे उस स्थापना से संपर्क कर सकते हैं. 

भुवन उन लोगों के लिए पसंदीदा बन गया है जो आसानी से अनेक जगहों को दिखाना चाहते हैं, जैसे एक खनन कम्पनी जोकि अपने वर्तमान या मुख्य स्थानों की प्रस्तुति दे रही हो वह भुवन का उपयोग कर सकती है. कईं शिक्षक भुवन द्वारा अपने शिष्यों को विषयों का ज्ञान प्रदान कर सकते हैं जैसे- इतिहास, भूगोल आदि. वैज्ञानिक भुवन से विषयगत जानकारियां लेते है जैसे भूमि के इस्तेमाल से सम्बंधित चित्र आदि, और उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ते हैं. कुछ प्रशासकों ने जमीनी स्तर पर योजनाओं के विकास के लिए भुवन को उपयोगी पाया हैं. 

भुवन के साथ वैज्ञानिक, शिक्षाविद, नीति निर्माता तथा आमा जनता बिना किसी संसाधनों के इस भूस्थानिक डाटा की विशाल मात्रा के एकीकरण का उपयोग कर सकते हैं. भुवन के उपकरण अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं उदहारण के लिए, इसका उपयोग भोगोलिक सर्वेक्षण के लिए किया जा सकता हैं, विद्यार्थी इसका उपयोग स्थानों को जानने और उनका अध्ययन करने के लिए कर सकते हैं. यह मिलापकारी सूचनायें प्रदान करता है जो की उपयोगकर्ता को देश के ऐसे स्थानों को खोजने में मदद करते हैं जहाँ वे व्यक्तिगत रूप से नहीं जा सकते. 


भुवन उपयोगकर्ता को संसाधन बनाने और उन्हें साझा करने में मदद करता है. अन्य उपयोगकर्ताओं से योगदान के साथ, दूर के स्थलों की खोज एवं ब्राउज़िंग करके भुवन उपयोगकर्ताओं को एक सम्मोहक अवसर प्रदान करता है. भुवन उपयोगकर्ताओं को योगदान भूगोल के संदर्भ में लघुकथाओं, कहानियों और इतिहास सम्बंधित संवाद करने की अनुमति देता है. 

उद्देश्य 

भुवन का उद्देश्य विभिन्न विषयों जैसे भूमि संसाधन, कृषि, मृदा, जल, महासागर विज्ञान, भूजल क्षमता, पारिस्थिक प्रणाली जैव विविधता आदि पर सूचना प्रदान करना है जो विभिन्न राष्ट्रीय मिशनों के तहद बहु-विभेदक सुदूर संवेदक चित्रों से प्राप्त की जाती हैं। यह भू स्थानिक सेवा निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रदान की जाती है: 

मृदा
देश के प्राकृतिक संसाधनों अपने निवासियों के आर्थिक विकास के लिए प्राथमिक महत्व के होते हैं, विशेषतः मृदा संसाधन जो मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भोजन, रेशा, और ईंधन की लकड़ी को उपजाने के लिए अनवीनीकरणीय महत्वपूर्ण संसाधन है। 

मृदा के किसी भी कार्य में हानि उनके गुणवत्ता, महत्त्व और परितंत्र की मूलभूत आवश्यकताओं को समर्थन करने की क्षमता में कमी लाती है। इसलिए मृदा संसाधन की विस्तृत सूचनाओं जैसे प्रकार, स्थानिक वितरण, प्रसार, सीमाएँ जैसे – कटाव, लवणीयकरण, क्षारियकरण, जल जमाव आदि और सम्बंधित संभावनाओं की विभिन्न उद्देश्यों के प्रयोजन के लिए आवश्यकता है। ऐसी सूचनाएं गैर-कृषि क्षेत्रों जैसे - सड़क निर्माण, रेलवे बाँधों, इंजीनियरिंग संरचनाओं आदि के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हमारे देश में मृदा संसाधनों के बारे में जानकारी का अभाव और अनुचित भूमि उपयोग की योजना के कारण वर्तमान समय में भूमि क्षरण की समस्या बढती जा रही है। समय के साथ साथ सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकी में भी उन्नति हुई है और इसे प्रचलानात्मक तरीके से मृदा और भू-क्षरण के विभिन्न पहलुओं पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। 

कृषि
अंतरिक्षवाहित सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकी और उनके अनुप्रयोगों के अपूर्व विकास ने कृषि संसाधानों की विस्तृत सूची के लिए अपार संभावनाएं स्थापित की है। 

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र कृषि के क्षेत्र जैसे फसल क्षेत्रफल और उत्पादन आंकलन, कृषि सूखा मूल्यांकन, बुआई पैटर्न/प्रणाली विश्लेषण, फसल निरीक्षण, फसल के स्थिति का आकलन और बागवानी फसल सूची आदि सहित विभिन्न परियोजनाओं पर काम किया है। यह प्रमुख खाद्य फसलों के लिए फसल कटाई के पूर्व की भी सूचना प्रदान करता है। 

परियोजना, राष्ट्रीय कृषि सूखा आंकलन निरीक्षण प्रणाली (NADAMS) के अंतर्गत मोटे विभेदक राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA)- उन्नत उच्चतर विभेदक विकिरणमापी द्वारा राज्य स्तर पर लिए गए डाटा और भारतीय सुदूर संवेदन वाईड फील्ड सेंसर (IRS - WiFS) & उन्नत वाईड फील्ड सेंसर (AWiFS) द्वारा राज्य और जिला स्तर पर प्राप्त डाटा का प्रयोग करते हुए कृषि की स्थिति का नित्य रूप से निरीक्षण किया जाता है। 

महासागर सेवाएं 
जनसंख्या में वृद्धि और तेजी से घट रहे भूमि संसाधनों ने महासागरीय संसाधनों के दोहन और शोषण की ओर अग्रसित किया है। महासागरीय संसाधनों का विवेकहीन दोहन परितंत्र मे असंतुलन पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त, महासागर जलवायु परिवर्तन द्वारा मानसून को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है जो हमारे आर्थिक विकास में निर्णायक है. 

सूदूर संवेदन प्रद्यौगिकी प्राकृतिक महासागर संसाधनों के प्रबंधन और अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है। जहाँ संभावित मत्स्य पालन (PFZ) क्षेत्र, तेल स्लिक, खनिज भंडार और पर्यटन आदि पर अध्ययन आर्थिक महत्व रखते हैं, वहीँ तटीय क्षेत्र, सदाबहार वनस्पति क्षरण, मूंगा विरंजन आदिका अध्ययन परितंत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने में उपयोगी हैं। 

जल
बढती हुई माँग को पूरा करने के लिए जल संसाधनों के इष्टतम प्रबंधन आवश्यक है जिसके लिए उचित योजना एवं प्रबंधन जरूरी है। वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा संकेत देता है कि कई बार उपयुक्त आंकड़ों की प्रचुर उपलब्धता उचित योजना और प्रबंधन के लिए प्रतिबंधक कारक होते हैं। 

हाल ही में, जल संसाधन विकास और प्रबंधन के भू-आंकड़ों के पूरण और सम्पूरण हेतु सुदूर संवेदन और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) को प्रभावी उपकरण के रूप में स्वीकार किया गया है। अंतरिक्षवाहित सुदूर संवेदी डेटा उपलब्ध जल संसाधनों और उनके प्रयोग हेतु समयोचित और विश्वसनीय प्रदान करता है. 

भारत में सुदूर संवेदन निवेश ने जल प्रबंधन के संरक्षण और नियंत्रण दोनों पहलुओं पर सार्थक योगदान दिया है। मामूली शुरुआत के बाद, सुदूर उपग्रह संवेदी प्रौद्योगिकी अब बर्फ जलविज्ञान, जलाशय अवसादन मूल्यांकन, सिंचाई जल प्रबंधन, जलविज्ञान सम्बन्धी अध्ययन, बाढ़ प्रबंधन आदि जटिल क्षेत्रों के प्रबंधन में उन्नति की है। 

परितंत्र
शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने भारत के बुनियादी ढ़ांचे और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को बढ़ा दिया है. वनों की कटाई, मृदा क्षरण, जल प्रदूषण और भूमिक्षरण से पारितंत्र बिगड़ता जा रहा है और भारत के आर्थिक विकास में रूकावट उत्पन्न कर रहे हैं। 

सुदूर संवेदन उपग्रहों द्वारा प्राप्त डाटा और भुवन से लिए गए चित्रों की सहायता से कुछ महत्वपूर्ण मामलों का समाधान करना संभव हो पाया है। पारितंत्र से संबंधित मुद्दों – पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, पर्यावरण प्रबंधन योजना, पर्यावरण परीक्षण, भू-क्षेत्र एवं जीवमंडल अध्ययनों, बदलते खेती के मानचित्रण आदि.

इसरो अध्यक्ष


डॉ. के. राधाकृष्णन (2009 - वर्तमान)

डॉ. के. राधाकृष्णन; वर्तमान अध्यक्ष अंतरिक्ष आयोग, सचिव, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार और अध्यक्ष इसरो; एक तकनीकी-तंत्र विशेषज्ञ; उत्तम वैयक्तिक और अंतर-वैयक्तिक विशेषताओं से युक्त सक्रिय और परिणामोन्मुख प्रबंधक; महत्वपूर्ण दृष्टिकोण सहित विदग्ध संस्था-निर्माता; सकारात्मक रवैये सहित एक सक्षम प्रशासक; और युवा पीढ़ी में नेतृत्व कौशल पनप देने के लिए श्रेय पाने वाले प्रेरक नेता हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उपयोग और अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रबंधन में 39 वर्षों से भी अधिक विस्तृत उनका लब्धप्रतिष्ठ कैरियर कई उपलब्धियों से सुसज्जित रहा है। 

डॉ. के. राधाकृष्णन 29 अगस्त 1949 को इरिन्जालाकुडा, केरल में पैदा हुए। उन्होंने ( 1970 में ) केरल विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की, आईआईएम बेंगलूर में पीजीडीएम पूरा किया (1976) और आईआईटी, खड़गपुर से अपने "भारतीय भू-प्रेक्षण प्रणाली के लिए कुछ सामरिक नीतियाँ" शीर्षक वाले शोध प्रबंध पर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की (2000)। 

1971 में इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम में एक उड्डयनकी इंजीनियर के रूप में अपने कॅरियर की शुरूआत की; उन्होंने इसरो में प्रशंसनीय रूप से कई निर्णायक पदों पर कार्य किया, जैसे प्रादेशिक सुदूर संवेदन केंद्रों की स्थापना के परियोजना निदेशक (1987-1989); संपूर्ण इसरो के बजट और आर्थिक विश्लेषण के निदेशक (1987-97), राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली-प्रादेशिक सुदूर संवेदन सेवा केंद्र के निदेशक (1989-97) दीर्घकालीन विकास के लिए समेकित मिशन के मिशन निदेशक तथा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी के उप निदेशक (1997-2000); राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी के निदेशक (2005-08); विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक (2007-09); तथा कुछ समवर्ती उत्तरदायित्वों के साथ सदस्य, अंतरिक्ष आयोग (अक्तूबर 2008-अक्तूबर 2009)। 2000-05 के दौरान महासागर सूचना सेवाओं के लिए भारतीय राष्ट्रीय केंद्र के संस्थापक निदेशक और भारतीय राष्ट्रीय सुनामी चेतावनी प्रणाली के प्रथम परियोजना निदेशक के रूप में उन्होंने एक निर्धारित कार्यकाल भू-विज्ञान मंत्रालय में बिताया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण पदों पर भी कार्य किया जिनमें शामिल हैं अंतर-सरकारी समुद्र विज्ञान आयोग के उपाध्यक्ष (2001-2005), संस्थापक अध्यक्ष, हिंद महासागर वैश्विक महासागरीय प्रेक्षण प्रणाली (2001-06) और समग्र यूएन-सीओपीयूओएस एसटीएससी के कार्यकारी समूह के अध्यक्ष (2008-2009)। 



श्री जी. माधवन नायर (2003-2009) 

फिलहाल श्री जी.माधवन नायर अन्तरर्रष्ट्रीय खगोलयानिकी अकादमी (आई.ए.ए.) के अध्यक्ष हैं । 

श्री जी. माधवन नायर का जन्म 31 अक्तूबर, 1943 को केरल के तिरुवनंतपुरम में हुआ था। उन्होंने 1966 में केरल विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि ग्रहण की और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई में प्रशिक्षण प्राप्त किया। 

1967 में उन्होंने थुम्बा भूमध्यरेखीय राकेट प्रमोचन केंद्र (टर्ल्स) में पदभार ग्रहण किया। तब से उन्होंने इसरो के अध्यक्ष पद को सँभालने तक मार्ग में कई शानदार उपलब्धियाँ हासिल करते हुए विभिन्न पदों को सँभाला। 

अध्यक्ष, इसरो/सचिव, अंतरिक्ष विभाग के रूप में अपने छह वर्षों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने 25 सफल मिशन उपलब्धियाँ हासिल की, यथा, इन्सैट-3ई, रिसोर्ससैट-1, एडुसैट, कार्टोसैट-1, हैमसैट-1, इन्सैट-4ए, पीएसएलवी-सी5, जीएसएलवी-एफ़1, पीएसएलवी-सी6, कार्टोसैट-2, इन्सैट-4बी, एसआरई-1, पीएसएलवी-सी7, पीएसएलवी-सी8, जीएसएलवी-एफ़04, इन्सैट-4सीआर, पीएसएलवी-सी10, कार्टोसैट-2ए, आईएमएस-1, पीएसएलवी-सी9, चंद्रयान-1, पीएसएलवी-सी11, पीएसएलवी-12, पीएसएलवी-C14 और ओशनसैट-2. 

अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष के रूप में श्री जी. माधवन नायर देश में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भावी योजना बनाने के लिए जिम्मेवार हैं। दूर चिकित्सा, दूर-शिक्षा और आपदा प्रबंधन सहायक प्रणालियों के लिए योजनाएँ कार्यान्वित करने के अलावा, प्रमुख ज़ोर एस्ट्रोसैट और चंद्रयान (चंद्रमा) मिशनों के उपयोग द्वारा बाह्य अंतरिक्ष की वैज्ञानिक अन्वेषण पर है। 



डॉ. कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन (1994-2003) 



डॉ. कृष्णस्वामी कस्तूरिरंगन फिलहाल योजना आयोग के सदस्य हैं । 

डॉ. कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन संप्रति योजना आयोग के सदस्य हैं। डॉ. कस्तूरीरंगन ने 27 अगस्त, 2003 में पद छोड़ने से पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष और भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के सचिव के रूप में 9 वर्षों से अधिक समय तक भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का शानदार तरीक़े से संचालन किया। 

वे प्रथम इसरो उपग्रह केंद्र के निदेशक थे, जहाँ उन्होंने नई पीढ़ी के अंतरिक्ष यान, भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इन्सैट-2) तथा भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह (आईआरएस-1ए व 1बी) और साथ ही, वैज्ञानिक उपग्रहों से संबंधित गतिविधियों का सर्वेक्षण किया। 

वे भारत के प्रथम दो प्रायोगिक भू-प्रेक्षण उपग्रह, भास्कर- I व II के परियोजना निदेशक भी थे और बाद में प्रथम संक्रियात्मक भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह, आईआरएस-1ए के समग्र निर्देशन की जिम्मेदारी सँभाली। 

इसके अतिरिक्त, उन्होंने समुद्री प्रेक्षण उपग्रह आईआरएस-पी3/पी4 के प्रमोचनों के साथ-साथ, विश्व के सर्वोत्तम नागरिक उपग्रह, आईआरएस-1सी और 1डी का अभिकल्पन, विकास और प्रमोचन, इन्सैट उपग्रहों की दूसरी पीढ़ी की प्राप्ति और तीसरी पीढ़ी के प्रवर्तन का देख-रेख कार्य भी सँभाला। इन प्रयासों ने भारत को अंतरिक्ष कार्यक्रम वाले मुट्ठी भर प्रमुख छह देशों के बीच पूर्व-प्रख्यात अंतरिक्ष-अग्रगामी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। 



प्रोफ़ेसर उडुपी रामचंद्र राव (1984-1994) 



यू.आर.राव सम्प्र​ति पी.आर.एल. शासी परिषद के अध्यक्ष ने ब्रह्माणीय किरण के वैज्ञानिक के रूप में अपना केरियर शुरू किया । 


प्रोफ़ेसर यू.आर.राव एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास और संचार तथा प्राकृतिक संसाधनों के सुदूर संवेदनों में उनके व्यापक उपयोग की दिशा में मौलिक योगदान दिया है। 

संप्रति वे अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की शासी परिषद के अध्यक्ष हैं। एमआईटी में संकाय सदस्य और टेक्सास विश्वविद्यालय, डलास में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य करने के बाद, जहाँ उन्होंने कई अग्रणी और अन्वेषण अंतरिक्षयानों पर प्रमुख प्रयोगकर्ता के रूप में खोज की, प्रोफ़ेसर राव 1966 में भारत लौटे और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद में प्रोफ़ेसर का पद सँभाला। 

तेजी से विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की अनिवार्य आवश्यकता से आश्वस्त, प्रोफ़ेसर राव ने 1972 में भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की स्थापना की जिम्मेदारी ली। उनके मार्गनिर्देशन के तहत, 1975 में प्रथम भारतीय उपग्रह 'आर्यभट्ट' से शुरूआत करते हुए संचार, सुदूर संवेदन और मौसमविज्ञानीय सेवाएँ प्रदान करने के लिए 18 से अधिक उपग्रह अभिकल्पित और प्रमोचित किए गए। 

1984 में अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव के रूप में पदभार सँभालने के बाद, प्रोफ़ेसर राव ने रॉकेट प्रौद्योगिकी के विकास को गति दी, जिसके परिणामस्वरूप एएसएलवी रॉकेट और ध्रुवीय कक्षा में 2.0 टन वर्ग के उपग्रहों को प्रमोचित करने में सक्षम, संक्रियात्मक पीएसएलवी प्रमोचन यानों का सफल प्रमोचन क्रियान्वित हुआ। प्रोफ़ेसर राव ने 1991 में भू-स्थिर प्रमोचन यान जीएसएलवी और क्रायोजनिक प्रौद्योगिकी के विकास को प्रवर्तित किया। 

प्रोफ़ेसर राव ने ब्रम्हांडीय किरणें, अंतर-ग्रहीय भौतिकी, उच्च ऊर्जा खगोल-विज्ञान, अंतरिक्ष उपयोग और उपग्रह तथा रॉकेट प्रौद्योगिकी पर 350 से अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी आलेख प्रकाशित किया है और कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने यूरोप के सबसे पुराने विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोलोग्ना सहित लगभग 21 विश्वविद्यालयों से डी.एस.सी. (ऑनोरिस कासा) की उपाधि भी पाई है। 



प्रोफ़ेसर सतीश धवन (1972-1984) 

भारत के वैज्ञानिक समुदाय द्वारा सतीश धवन को परीक्षणात्मक तरल गतिकी अनुसंधान का जनक माना जाता है । 

प्रोफ़ेसर सतीश धवन (25 सितंबर 1920 – 3 जनवरी 2002) एक भारतीय रॉकेट वैज्ञानिक थे जिनका जन्म भारत के श्रीनगर में और शिक्षा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में संपन्न हुई। उन्हें भारतीय वैज्ञानिक समुदाय द्वारा भारत में प्रायोगिक तरल गतिकी अनुसंधान का जनक और विक्षोभ और परिसीमा परतों के क्षेत्र के प्रख्यात शोधकर्ताओं में से एक माना जाता है। 

उन्होंने 1972 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष के रूप में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई का स्थान ग्रहण किया। वे अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार के सचिव भी रहे हैं। उनकी नियुक्ति के बाद के दशक में उन्होंने असाधारण विकास और शानदार उपलब्धियों के दौर से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को निर्देशित किया। 

जिस समय वे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के अध्यक्ष थे, उस समय भी उन्होंने परिसीमा परत अनुसंधान के लिए पर्याप्त प्रयास समर्पित किया। उनके सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान हर्मन शिलिच्टिंग की मौलिक पुस्तक बाउंड्री लेटर में प्रस्तुत है। 

वे बेंगलूर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के लोकप्रिय प्रोफ़ेसर थे। उन्हें आईआईएससी में भारत के सर्वप्रथम सुपरसोनिक विंड टनल स्थापित करने का श्रेय जाता है। उन्होंने वियुक्त परिसीमा स्तर प्रवाह, तीन-आयामी परिसीमा परत और ट्राइसोनिक प्रवाहों की पुनर्परतबंदी पर अनुसंधान का भी बीड़ा उठाया। 

प्रोफ़ेसर सतीश धवन ने ग्रामीण शिक्षा, सुदूर संवेदन और उपग्रह संचार पर अग्रगामी प्रयोग किए। उनके प्रयासों से इन्सैट-एक दूरसंचार उपग्रह, आईआरएस-भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह और ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (पीएसएलवी) जैसी प्रचालनात्मक प्रणालियों का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसने भारत को अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले राष्ट्रों के संघ में खड़ा कर दिया। 

2002 में उनकी मृत्यु के बाद, दक्षिण भारत के चेन्नई की उत्तरी दिशा में लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर श्रीहरिकोटा, आंध्रप्रदेश में स्थित भारतीय उपग्रह प्रमोचन केंद्र का प्रोफ़ेसर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के रूप में पुनर्नामकरण किया गया। 


प्रोफ़ेसर एम.जी.के. मेनन (जनवरी - सितम्बर 1972) 

फिलहाल प्रो.एम.जी.के. मेनन अन्तरिक्ष विभाग/इसरो में सलाहकार हैं । 

प्रोफ़ेसर एम.जी.के. मेनन अंतरिक्ष विभाग/भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वर्तमान परामर्शदाता हैं। 

वे भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, कोलकाता के अध्यक्ष हैं (1990-)। 

प्रोफ़ेसर मेनन भारत में सभी तीनों विज्ञान अकादमियों के फ़ेलो हैं; और वे प्रत्येक के अध्यक्ष रह चुके हैं। 

प्रोफ़ेसर मेनन ने ब्रह्मांडीय ब्रह्मांडी किरणों के अध्ययन के क्षेत्र में अन्वेषण और विशेषकर प्राथमिक कणों की उच्च ऊर्जा परस्पर क्रिया के लिए विख्यात हैं। किरणों, कण भौतिकी में वैज्ञानिक कार्य किया है। 



डॉ. विक्रम साराभाई (1963-1972) 

डॉ.विक्रम साराभाई को भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है । 

डॉ. साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है; वे महान संस्थान निर्माता थे और उन्होंने विविध क्षेत्रों में अनेक संस्थाओं की स्थापना की या स्थापना में मदद की। अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई: केम्ब्रिज से 1947 में आज़ाद भारत में वापसी के बाद, उन्होंने अपने परिवार और मित्रों द्वारा नियंत्रित धर्मार्थ न्यासों को अपने निवास के पास अहमदाबाद में अनुसंधान संस्थान को धन देने के लिए राज़ी किया। इस प्रकार 11 नवंबर, 1947 को अहमदाबाद में विक्रम साराभाई ने भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की स्थापना की। उस समय उनकी उम्र केवल 28 वर्ष थी। साराभाई संस्थानों के निर्माता और संवर्धक थे और पीआरएल इस दिशा में पहला क़दम था। विक्रम साराभाई ने 1966-1971 तक पीआरएल की सेवा की। 

वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। वे अहमदाबाद में स्थित अन्य उद्योगपतियों के साथ मिल कर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, अहमदाबाद की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित कतिपय सुविख्यात संस्थान हैं: 
  • भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद 
  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम), अहमदाबाद 
  • कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद 
  • दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद (अपनी पत्नी के साथ मिल कर) 
  • विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम 
  • स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद (यह संस्थान साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/केंद्रों के विलय के बाद अस्तित्व में आया) 
  • फ़ास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ़बीटीआर), कल्पकम 
  • वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता 
  • इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(ईसीआईएल), हैदराबाद 
  • यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(यूसीआईएल),जादूगुडा, बिहार 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना उनकी महान उपलब्धियों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के प्रमोचन के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राज़ी किया। 

भारतीय परमाणु विज्ञान कार्यक्रम के जनक के रूप में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने भारत में प्रथम राकेट प्रमोचन केंद्र की स्थापना में डॉ.साराभाई का समर्थन किया। यह केंद्र मुख्यतः भूमध्यरेखा से उसकी निकटता की दृष्टि से, अरब महासागर के तट पर, तिरुवनंतपुरम के निकट थुम्बा में स्थापित किया गया। अवसंरचना, कार्मिक, संचार लिंक, और प्रमोचन मंचों की स्थापना के उल्लेखनीय प्रयासों के बाद, 21 नवंबर, 1963 को सोडियम वाष्प नीतभार सहित उद्घाटन उड़ान प्रमोचित की गयी। 

1966 में नासा के साथ डॉ.साराभाई के संवाद के परिणामस्वरूप, जुलाई 1975-जुलाई 1976 के दौरान उपग्रह अनुदेशात्मक दूरदर्शन परीक्षण (एसआईटीई) का प्रमोचन किया गया (जब डॉ. साराभाई का स्वर्गवास हो चुका था)। 

डॉ. साराभाई ने भारतीय उपग्रहों के संविरचन और प्रमोचन के लिए परियोजना प्रारंभ की। परिणामस्वरूप, प्रथम भारतीय उपग्रह, आर्यभट्ट, रूसी कॉस्मोड्रोम से 1975 में कक्षा में स्थापित किया गया। 

डॉ. साराभाई विज्ञान की शिक्षा में अत्यधिक दिलचस्पी रखते थे और 1966 में सामुदायिक विज्ञान केंद्र की स्थापना अहमदाबाद में की। आज यह केंद्र विक्रम साराभाई सामुदायिक विज्ञान केंद्र कहलाता है।