सैटकॉम प्रौद्योगिकी
उपग्रह संचार (सैटकॉम) प्रौद्योगिकी, देश के सुदूर कोनों में अत्यधिक दूरियों में विस्तृत असंख्य जन तक एक ही समय में पहुँचने की अनुपम क्षमता प्रस्तुत करता है। अनुप्रयोग उन्मुख प्रयास और देश के लिए प्रोद्भूत लाभ, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का प्रमाणक है। पिछले ढाई दशकों में भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इन्सैट) प्रणाली से देश में दूरसंचार, टेलीविज़न प्रसारण, डीटीएच सेवाएँ, व्यावसायिक संचार, ग्रामीण संसाधन केन्द्र, सुदूर-शिक्षा, टेली-मेडिसिन, ग्राम संपदा केंद्र, खोज और बचाव प्रचालन और आपातकालीन संचार में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है।
इन्सैट प्रणाली अंतरिक्ष विभाग, दूरसंचार विभाग, भारत मौसम विभाग, आकाशवाणी और दूरदर्शन का संयुक्त उद्यम है। 1983 में स्थापित,ग्यारह उपग्रह के प्रचालन सहित इन्सैट प्रणाली, एशिया प्रशांत क्षेत्र का बृहत् घरेलू संचार उपग्रह प्रणालियों में से एक है। ये उपग्रह, मौसम संबंधी उपकरणों के अलावा, सी, विस्तृत सी तथा के.यू. बैण्ड में 200 से अधिक उपग्रहों का वहन करता है।
दूर-शिक्षा, दूरस्थ-चिकित्सा तथा आपदा प्रबंधन प्रणाली (डीएमएस) की सहायता सहित विविध सामाजिक उपयोगों के लिए, इन्सैट का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण संसाधन केन्द्र (वीआरसी) को प्राकृतिक संपदा, भू और जल संसाधन प्रबंधन, दूर-चिकिस्ता, दूर-शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्वास्थ्य-सुरक्षा और परिवार कल्याण कार्यक्रमों के लिए जानकारी उपलब्ध कराने हेतु इन्सैट तथा आईआरएस उपग्रहों द्वारा प्रस्तुत सेवाएँ प्रदान करने वाले एकल पटल एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया है। इन्सैट से मौसम संबंधी आँकड़े का उपयोग मौसम के पूर्वानुमान के लिए किया जाता है और चक्रवात जैसे आसन्न आपदा के प्रति चेतावनी के सीधे संचरण के लिए, असुरक्षित तटवर्ती क्षेत्रों में विशिष्ट रूप से डिज़ाइन किए गए आपदा पूर्व-सूचना अभिग्राही संस्थापित किए गए हैं।
इन्सैट प्रणाली के प्रमुख अनुप्रयोग हैं:
एडुसैट कार्यक्रम
भू-तुल्यकाली उपग्रह प्रमोचन यान (जीएसएलवी-एफ़01) द्वारा सितंबर 2004 में प्रमोचित एडुसैट, केवल शैक्षणिक सेवाओं के लिए समर्पित भारत का पहला विषयपरक उपग्रह है। उपग्रह को विशेष रूप से अन्योन्य-क्रिया वाली कक्षाओं के निर्माणार्थ, मल्टी-मीडिया बहु-केंद्रक प्रणाली के नियोजन द्वारा, दृश्य-श्रव्य माध्यमों के ज़रिए प्रसारण के लिए संरूपित किया गया है। एडुसैट में भारत के विविध भागों को आवृत करते हुए अनेक क्षेत्रीय बीम हैं - देश के उत्तर, उत्तरपूर्व, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम क्षेत्रों को आवृत करते हुए पाँच के. यू बैंड प्रेषानुकर, भारतीय मुख्यभूमि क्षेत्र को अपने पदचिह्न से आवृत करते हुए एक के. यू बैंड प्रेषानुकर और पूरे देश को अपने पदचिह्न से आवृत करते हुए छह सी-बैंड प्रेषानुकर। एडुसैट को तीन चरणों में कार्यान्वित किया जा रहा है, प्रायोगिक, अर्ध-प्रचालन और प्रचालन चरण। जबकि प्रायोगिक चरण जारी रहा है, अर्ध-प्रचालन और प्रचालन चरण को वर्ष के दौरान कार्यान्वित किया गया।
एडुसैट पहले से ही एकतरफ़ा टी.वी.प्रसारण, अन्योन्य-क्रिया टी.वी., वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, कंप्यूटर कॉन्फ़्रेंसिंग, वेब-आधारित अनुदेश आदि जैसे व्यापक शैक्षिक वितरण विधियाँ उपलब्ध करा रहा है।
अब तक चौंसठ नेटवर्क स्थापित किए जा चुके हैं, जिनमें से 10 नेटवर्क राष्ट्रीय के. यू बैंड बीम का उपयोग करते हैं और 36 नेटवर्क क्षेत्रीय के. यू बैंड तथा विस्तृत-सी बैंड राष्ट्रीय बीमों पर सक्रिय हैं। कुल लगभग 34699 कक्षाओं सहित 3386 अन्योन्य-क्रिया कक्षाएँ और 31313 केवल अभिग्राही कक्षाएँ मौजूद हैं। सभी द्वीपों (अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप), उत्तर-पूर्वी राज्यों और जम्मू व कश्मीर सहित लगभग पूरे देश को आवृत करते हुए 24 राज्यों में पहले ही नेटवर्क स्थापित किए जा चुके हैं। बाक़ी राज्यों में कार्यान्वयन प्रगति पर है।
विशेष नेटवर्क
एडुसैट पर नवोन्मेषी नेटवर्कों में एक है "दृष्टिहीनों के स्कूलों" के लिए नेटवर्क। ब्लाइंड पीपल्स एसोसिएशन, अहमदाबाद दृष्टिहीन लोगों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, रोज़गार और पुनर्वास को बढ़ावा देने वाला एक अग्रणी संगठन है। दृष्टिहीनों की विशिष्ट आवश्यकताओं पर विचार करते हुए, सक्रिय ऑडियो और आँकड़ा वितरित करने वाला एक बिल्कुल अलग तरह का प्रसारण नेटवर्क विन्यास स्थापित किया गया, जिसे दृष्टिहीन मुद्रित चिह्न (ब्रेल) के माध्यम से पढ़ते हैं।
इंजीनियरिंग के विभिन्न विषयों पर आठ-सप्ताह के पाठ्यक्रम को चलाने के लिए अमेरिका के शीर्ष 21 विश्वविद्यालयों से भारत आने वाले विशिष्ठ प्रोफ़ेसर/संकाय द्वारा पाठ पढ़ाने हेतु पूरे देश में 50 इंजीनियरिंग संस्थानों को जोड़ते हुए विस्तृत सी-बैंड में एक और विशेष नेटवर्क स्थापित किया गया है। यह नेटवर्क अब अतिरिक्त 30 अंतिम प्रयोक्ताओं सहित आईआईटी-मुंबई के नेटवर्क से साझा किया गया है।
इसके अतिरिक्त, आईआईएम, बेंगलूर के लिए चेन्नै में उसके अन्य केंद्र के साथ संयोजित नेटवर्क; विद्यार्थियों और सामान्य जनता के बीच वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के सभी पाँच केंद्रों को जोड़ता हुआ एक विस्तृत सी-बैंड नेटवर्क; महाभारत संस्थान के लिए परिरक्षणार्थ केंद्रीकृत पुरालेख केंद्र को मोबाइल टर्मीनल के माध्यम से सुदूर क्षेत्रों के ज़रिए डिजिटाइज़ की गई पांडुलिपियों के ऑनलाइन संचरण के लिए नेटवर्क; केरल में मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के माता-पिता और उनके विद्यालयों के अध्यापकों को शिक्षित करने और जागरूकता पैदा करने के लिए दो नेटवर्क; नेत्र-अनुरक्षण प्रदान करने के लिए अरविंद वर्चुअल अकादमी के केंद्रों को तमिलनाडु और पांडिचेरी में जोड़ता नेटवर्क; आदि कुछ विशिष्ट नेटवर्क हैं, जिन्हें एडुसैट उपयोगिता कार्यक्रम के अधीन स्थापित/कार्यान्वित किया गया है।
शैक्षणिक टी.वी. सेवाएँ
इन्सैट का उपयोग तमिल, मराठी, उड़िया, तेलुगू और हिन्दी में प्राथमिक विद्यालयों के बच्चो के लिए शैक्षणिक टी.वी. (ईटीवी) उपलब्ध कराने के लिए किया जा रहा है। राष्ट्रीय नेटवर्क पर एक उच्च शिक्षा (महाविद्यालयीन क्षेत्र) पर सामान्य संवर्धन कार्यक्रम प्रसारित किया जा रहा है। ये कार्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा, अपने देश भर में कक्षा कार्यक्रम के भाग के रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (आईजीएनओयू) विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क के ज़रिए प्रति दिन आधे घंटे का पाठ्यक्रम आधारित व्याख्यान प्रसारित करता है।
प्रशिक्षण और विकासात्मक संचार चैनल (टीडीसीसी)
प्रशिक्षण, विकास और संचार चैनल (टीडीसीसी) के लिए - कुल 8 विस्तृत सी-बैंड चैनल - इन्सैट-3बी पर 6 और एडुसैट पर 2 - का उपयोग किया जा रहा है, जो सेवा 1995 से प्रचालन में है। यह अन्योन्य-क्रिया शिक्षा की एक-तरफ़ा वीडियो और दो-तरफ़ा ऑडियो प्रणाली उपलब्ध कराती है। पाठ पढ़ाने के छोर पर एक स्टूडियो और लाइव या पहले से रिकॉर्ड किए गए व्याख्यानों को प्रसारित करने के लिए एक अपलिंक सुविधा शामिल है। देश भर में स्थित कक्षाओं में सहभागी सामान्य डिश एंटेना (डीआरएस) के माध्यम से व्याख्यान प्राप्त करते हैं टेलीफ़ोन लाइनों का उपयोग करते हुए प्राध्यापकों के साथ परस्पर-क्रिया करने की उनके पास सुविधा उपलब्ध है।
कई राज्य सरकारें और विश्वविद्यालयों द्वारा सुदूर शिक्षा, ग्रामीण विकास, महिला और बाल विकास, पंचायती राज, स्वास्थ्य, कृषि, वानिकी आदि के लिए टीडीसीसी प्रणाली का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। शिक्षण-छोर अब गुजरात, मध्यप्रदेश, उड़िसा, कर्नाटक और गोआ में उपलब्ध हैं। डीआरएस नेटवर्क में देश भर में 5000 से ज़्यादा कक्षाएँ फैली हुई हैं।
ग्रामसैट कार्यक्रम
ग्रामसैट कार्यक्रम (जीपी) राज्य स्तर पर, राज्य की राजधानी को जिलों और खंड़ों से जोडने के लिए संचार नेटवर्क उपलब्ध कराने की एक पहल है। नेटवर्क द्वारा कंप्यूटर संयोजकता, आँकड़ा प्रसारण और टी.वी. प्रसारण सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, जिनमें ई-शासन, राष्ट्रीय संसाधन सूचना प्रणाली (एनआरआईएस), विकास सूचना, टेली-कॉन्फ़्रेंसिंग, आपदा प्रबंधन, दूर-चिकित्सा और सुदूर शिक्षा जैसे अनुप्रयोग शामिल हैं।
ग्रामसैट नेटवर्क उड़ीसा, अंडमान और निकोबार द्वीप-समूह, राजस्थान तथा पश्चिम बंगाल में सक्रिय है। अब राज्य नेटवर्कों के लिए एकल केंद्र के माध्यम से समेकित सेवाएँ - अर्थात् संकर प्रणालियों के ज़रिए निर्बाध सूचना के लिए मौजूदा संचार अवसंस्वनाओं सहित विविध विकासात्मक सेवाओं के लिए ग्रिड उपलब्ध कराने की योजनाएँ हैं।
दूर-चिकित्सा (टेलीमेडिसिन) कार्यक्रम
दूर-चिकित्सा कार्यक्रम, देश के सुदूर, दूरवर्ती और अल्प-सेवा पाने वाले क्षेत्रों के साथ स्वास्थ्य-देखरेख सेवाओं के लिए बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और मेडिकल साइन्स सहित उपग्रह संचार प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रोद्योगिकी के लाभों के तालमेल की एक नवोन्मेषी प्रक्रिया है।
भारत की एक अरब से अधिक आबादी के लिए स्वास्थ्य-देखरेख उपलब्ध कराना, जिसमें लगभग 75 प्रतिशत ग्रामों में बसे हों, एक अत्यंत कठिन कार्य है। लगभग 75 प्रतिशत डॉक्टर शहरों में और 23 प्रतिशत अर्ध-शहरी क्षेत्रों में व्यवसाय चलाते हैं। इससे केवल 2 प्रतिशत योग्यता प्राप्त डॉक्टर बचते हैं, जो ग्रामों में बसी 70 प्रतिशत आबादी की देखभाल के लिए, लगभग 23,000 प्राथमिक स्वास्थ्य और 3000 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े हैं।
इसरो द्वारा वर्ष 2001 में दूर-चिकित्सा प्रायोगिक परियोजना की शुरूआत, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन संकल्पना के प्रमाण के अंश के रूप में आधारिक स्तर की आबादी को दूर-चिकित्सा सुविधा प्रवर्तित करने के उद्देश्य से की गई। दूर-चिकित्सा सुविधा ज़रूरतमंद और अल्प-सेवा पाने वाली आबादी को विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराने के लिए इन्सैट उपग्रहों के माध्यम से सुदूर जिलों के अस्पताल/स्वास्थ्य केंद्रों को शहरों के सुपर स्पेशैलिटी अस्पतालों से जोड़ती है।
इसरो में दूर-चिकित्सा पहल मोटे तौर पर निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित की गई है:
- दूर-चिकित्सा प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराना तथा दूर-परामर्श, उपचार एवं डॉक्टरों व पराचिकित्सकों के प्रशिक्षणार्थ सुदूर/ग्रामीण अस्पतालों और सुपर स्पेशैलिटी अस्पतालों के बीच संबंध स्थापित करना।
- मेडिकल कॉलेजों और स्नातकोत्तर मेडिकल संस्थानों/अस्पतालों के बीच चिकित्सकीय शिक्षा (सीएमई) जारी रखने के लिए प्रौद्योगिकी और संयोजकता उपलब्ध कराना।
- विशेष रूप से नेत्रविज्ञान और सामुदायिक स्वास्थ्य के क्षेत्रों में ग्रामीण स्वास्थ्य शिविरों के लिए मोबाइल दूर-चिकित्सा एककों हेतु प्रौद्योगिकी और संयोजकता उपलब्ध कराना।
- आपदा प्रबंधन सहाय और राहत के लिए प्रौद्योगिकी और संयोजकता उपलब्ध कराना।
सम्प्रति, इसरो के दूर-चिकित्सा नेटवर्क ने 382 अस्पतालों में दूर-चिकित्सा सुविधा सक्षम किया है। 306 सुदूर/ग्रामीण/जिला अस्पताल/स्वास्थ्य केंद्र और 16 मोबाइल दूर-चिकित्सा एकक प्रमुख शहरों में अवस्थित 51 सुपर स्पेशैलिटी अस्पतालों से जुड़े हैं। दूर-नेत्रिकी, मधुमेह जाँच, मैमोग्राफ़ी, बच्चों की देखभाल और सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए मोबाइल वाहनों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। मोबाइल दूर-नेत्रिकी सुविधाएँ ग्राम स्तर पर नेत्र शिविरों, मोतियाबिंद/सबलवायु/मधुमेह दृष्टिपटल विकृति सहित नेत्रों की देखभाल में ग्रामीण जनता को सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं।
दूर-चिकित्सा सुविधाएँ जम्मू और कश्मीर, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप द्वीपसमूह, उत्तर-पूर्वी राज्य आदि सहित देश के कई राज्यों और संघशासित प्रदेशों के कई सुदूर ग्रामीण जिलों के अस्पतालों में स्थापित की गई हैं। कर्नाटक, केरल, राजस्थान, महाराष्ट्र, उड़िसा और छत्तीसगढ़ में राज्य स्तरीय दूर-चिकित्सा नेटवर्क स्थापित किए गए हैं। उड़िसा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और गुजरात के कई अभ्यंतर जिलों में दूर-चिकित्सा सुविधा मौजूद है। प्रति वर्ष लगभग 1.5 लाख मरीज़ दूर-चिकित्सा का लाभ पा रहे हैं।
टेलीविज़न
इन्सैट भारत में टेलीविज़न व्याप्ति के विस्तार के लिए प्रमुख उत्प्रेरक रहा है। उपग्रह टेलीविज़न अब 100% क्षेत्रों में 100% आबादी को आवृत करता है। स्थलीय व्याप्ति भारतीय भू परिमाण के 65 से अधिक और आबादी के 90 प्रतिशत से अधिक है। सम्प्रति इन्सैट-3ए, इन्सैट-4बी, इन्सैट-3सी और इन्सैट-2ई के सी-बैंड प्रेषानुकरों के माध्यम से नए अपलिंकों समेत 40 दूरदर्शन टी.वी.चैनल प्रचालित हो रहे हैं (इसके अलावा आईएस-10 और आईएस-906 इनटेलसैट लीज़ पर है)। सभी उपग्रह टी.वी.चैनल डिजिटल हैं।
दूरदर्शन द्वारा निम्नलिखित उपग्रह टेलीविज़न सेवाएँ प्रचालित की जा रही हैं:
राष्ट्रीय नेटवर्किंग सेवा (डीडी-1), डीडी समाचार (डीडी-2), डीडी-खेल, डीडी-उर्दू, डीडी-इंडिया, डीडी-भारत, डीडी-भारती।
केरल, कर्नाटक, जम्मू और कश्मीर, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, असम, महाराष्ट्र, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, त्रिपुरा, उड़िसा, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड (उत्तरांचल), हरियाणा, मिज़ोरम, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों में क्षेत्रीय सेवाएँ।
दिसंबर, 2008 के इन्सैट प्रणाली में दूरदर्शन के 1412 प्रेषित्र कार्य कर रहे हैं जिनमें से 1133 प्रेषित्र (130 उच्च शक्ति प्रेषित्र (एचपीटी), 728 निम्न शक्ति प्रेषित्र (एलपीटी), 257 अति निम्न शक्ति वाले प्रेषित्र (वीएलपीटी) और 18 परिवर्तक) डीडी-1 नेटवर्क में कार्यरत हैं और 167 टी.वी. प्रेषित्र (77 एचपीटी, 78 एलपीटी और 16 वीएलपीटी) डीडी-समाचार नेटवर्क में कार्यरत हैं। 108 क्षेत्रीय सेवा प्रेषित्र (6 एचपीटी, 8 एलपीटी और 94 वीएलपीटी), डिजिटल संचरण सहित 4 एचपीटी भी दूरदर्शन नेटवर्क में प्रचालित हैं। इन 4 प्रेषित्रों में से दिल्ली में अवस्थित एक प्रेषित्र प्रायोगिक उद्देश्य से 16 मोबाइल टी.वी.सेवाएँ चला रहा है। डीटीएच सेवा ("डीडी डायरेक्ट+") के माध्यम से 45 डीडी और निजी टी.वी.चैनल प्रचालित हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप-समूह के लिए सी-बैंड में आयोजित 10 चैनल डीटीएच संस्थापनाधीन है।
इन्सैट भारतीय क्षेत्र पर डीटीएच प्रसारण सेवा के लिए बैण्ड विस्तार उपलब्ध कराता है। सम्प्रति डीटीएच सेवा इन्सैट-4 श्रृंखला के माध्यम से प्रचालन में है। इन्सैट-4 श्रृंखला में पूरे भारत में अभिग्रहण दिशा में टीवीआरओ के 60/90 सें.मी. डिश सहित डीटीएच सेवा के समर्थन में 52 डी बी डब्ल्यू ईआईआरपी (ईओसी) के साथ उच्च शक्ति प्रेषानुकर हैं।
टाटा-स्काई कुल 150 वीडियो चैनलों सहित इन्सैट-4ए के ज़रिए 83 डिग्री पूर्व में डीटीएच सेवा प्रचालित करता है। दूरदर्शन (डीडी-डाइरेक्ट) निःशुल्क प्रसारण वाले 48 चैनलों सहित इन्सैट-4बी के ज़रिए 93.5 डिग्री पूर्व पर डीटीएच सेवा प्रचालित करता है। सन डाइरेक्ट और भारती एयरटेल जैसे अन्य निजी डीटीएच सेवा प्रदाताओं ने भी इन्सैट-4बी और इन्सैट-4सीआर के ज़रिए, जोकि 74 डिग्री पूर्व अवस्थित है, डीटीएच सेवा प्रारंभ की है।
समग्रतः. 10 मिलियन से अधिक डीडी डायरेक्ट टीवीआरओ की संख्या सहित विभिन्न सेवा प्रदाताओं द्वारा पूरे भारत में लगभग 16.2 मिलियन टीवीआरओ संवितरित और प्रचालित हैं।
उपग्रह समाचार संग्रहण और प्रसार
इन्सैट प्रणाली का उपयोग करते हुए उपग्रह समाचार संग्रहण द्वारा तत्काल वास्तविक-समय समाचार कवरेज और विभिन्न स्थलों पर महत्वपूर्ण घटनाओं को दिल्ली के केंद्रीय स्टेशन या राज्य की राजधानियों द्वारा अपने-अपने दूरदर्शन चैनलों पर पुनःप्रसारण करने के लिए प्रसार सक्षम हो पाता है। प्रसार भारती के पास इन्सैट, आईएस-10 और आईएस-906 नेटवर्क के माध्यम से प्रचालित होने वाले 12 सी-बैंड और 16 के.यू-बैंड डिजिटल आउटडोर-ब्रॉडकास्टिंग डीएसएनजी टर्मिनल हैं। के.यू-बैंड में 2 और सी-बैंड में 6 डीएसएनजी टर्मिनल अधिष्ठापन की प्रक्रिया में हैं। 11वीं योजना के दौरान सी-बैंड में और 16 डीएसएनजी नेटवर्क में प्रवर्तित करने का प्रस्ताव है।
प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) द्वारा इन्सैट-3सी की प्रसारण सुविधाओं के उपयोग द्वारा विस्तृत मीडिया और अन्य प्रयोक्ताओं को तेज़ गति और वर्धित मात्रा और विविधता के साथ सीधे अपनी समाचार और सूचना सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए एक प्रणाली का कार्यान्वयन किया जा रहा है। परियोजना द्वारा उपग्रह के प्रसारण (CxS) ट्रान्सपॉन्डरों में से एक पर रेडियो नेटवर्किंग (आरएन) प्रकार के चैनल का उपयोग किया जाता है। पीटीआई उपग्रह समाचार और प्रतिकृति प्रसार परियोजना 15 टर्मिनलों के साथ कार्य कर रहा है (पीटीआई से 14 और एक आकाशवाणी के साथ साझा)।
आकाशवाणी द्वारा सुदूर स्थलों पर होने वाले कार्यक्रमों के कवरेज के लिए और इन्सैट के माध्यम से घटनास्थल से सीधे कार्यक्रमों को प्रसारित करने के लिए आठ सुवाह्य अपलिंक टर्मिनलों (डीएसएनजी) का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा विभिन्न आकाशवाणी केंद्रों में तीन और डीएसएनजी टर्मिनल प्रवेश की प्रक्रिया में हैं। ये टर्मिनल किसी भी सुदूर स्थान से सीडी क्वालिटी के म्यूज़िक चैनल अपलिंक करने में सक्षम हैं।
रेडियो नेटवर्क
इन्सैट के ज़रिए रेडियो नेटवर्क (आरएन) राष्ट्रीय और साथ ही क्षेत्रीय नेटवर्किंग के लिए विश्वसनीय उच्च-तदरूपी कार्यक्रम उपलब्ध कराता है। सम्प्रति, 235 आकाशवाणी (एआईआर) केंद्र S-बैंड अभिग्राही टर्मिनलों से सुसज्जित हैं, जिनमें से 200 आकाशवाणी केंद्रों को C-बैंड एनलॉग और डिजिटल आरएन वाहकों को प्राप्त करने के लिए भी सुसज्जित किया गया है और बाक़ी केंद्रों को ग्यारहवीं योजना के अंत तक एनलॉग और डिजिटल C-बैंड आरएन टर्मिनलों से सुसज्जित किया जाएगा।
सम्प्रति कुल 104 आरएन चैनलों को अप-लिंक किया जा रहा है। इनमें से, CxS में 43 और CxC बैंडों में 61 प्रचालित हो रहे हैं। इसके लिए आकाशवाणी इन्सैट-3सी के दो S-बैंड ट्रान्सपॉन्डर (आंशिक) और एक C-बैंड का उपयोग कर रहा है। CxC बैंड में कुल 90 वाहकों पर इन्सैट-3सी के एक ट्रान्सपॉन्डर के पूरे उपयोग द्वारा अप-लिंक के लिए विचार किया जा रहा है।
आकाशवाणी नेटवर्क में, कुल 32 भू-केंद्र मौजूद हैं जिनमें CxS और CxC दोनों बैंड आवृत्तियों में अपलिंक की सुविधा है। प्रसारण गृह, नई दिल्ली में केंद्रीय भू-केंद्र को CxS और CxC बैंड पर 22 आरएन वाहक अपलिंक के लिए संवर्धित किया गया है।
दूरसंचार
इन्सैट दूरसंचार नेटवर्क में 8177 दो-तरफ़ा वाक् परिपथ उपलब्ध कराते हुए, विभिन्न आकार और क्षमताओं के (निकनेट और वीसैट माइक्रो टर्मिनलों के अलावा) कुल 620 दूरसंचार टर्मिनल प्रचालन में हैं। इनमें शामिल हैं 95 बीएसएनएल, 170 सरकारी प्रयोक्ताओं के लिए और 204 संवृत प्रयोक्ता समूह (सीयूजी)/वीसैट प्रचालक भू-केंद्र। और बीएसएनएल के पास 355 संवृत प्रयोक्ता समूह (सीयूजी)/वीसैट प्रचालक भू-केंद्र। 80 बहु चैनल प्रति वाहक (एमसीपीसी) वीसैट, 10 आरएबीएमएन वीसैट और एचवीनेट के अधीन 3100 Ku बैंड वीसैट कार्यरत हैं। इन्सैट के माध्यम से कुल 1,02,421 सीयूजी वीसैट प्रचालन में हैं।
नैशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन, भारतीय गैस प्राधिकरण लिमिटेड, न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन, भारतीय टेलीफ़ोन उद्योग, तेल और प्राकृतिक गैस आयोग, राष्ट्रीय खाद निगम और कोल इंडिया लिमिटेड, डीपीएनईटी, ईआरएनईटी, आईडीआरबीटी, कर्नाटक पावर ट्रांस्मिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड, आईटीआई, जीएनएफ़सी, वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कं.लि. आईओसीएल, ख़ज़ाने नेट, बीपीसीएल, जयप्रकाश इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड. भारतीय रेलवे परियोजना प्रबंधन इकाई के लिए नियंत्रित उपग्रह-आधारित नेटवर्क प्रचालन में हैं। राष्ट्रीय स्टॉक - एक्सचेंज वीसैट नेटवर्क एंव बी. एस. ई नेटवर्क विस्तारित सी-बैण्ड के प्रचालन में हैं। इन्सैट के साथ कई नियंत्रित सरकारी नेटवर्क भी कार्य कर रहे हैं। अनेक संगठन इन्सैट का उपयोग करते हुए अपने ही नियंत्रित नेटवर्कों के कार्यन्वयन की प्रक्रिया में हैं।
मोबाइल उपग्रह सेवाएँ
2002 में इन्सैट-3सी और 2003 में जीसैट2 के प्रमोचन के साथ एक एस-बैंड उपग्रह सेवा (एमएसएस) इन्सैट प्रणाली में जोड़ी गई। एमएसएस के लिए सेवाओं की निम्न दो श्रेणीयों की पहचान की गई:
भारतीय उद्योगों की सहभागिता से वाक्/डेटा संचार के लिए इन्सैट के साथ काम करने वाला एक छोटा सुवाह्य उपग्रह टर्मिनल विकसित किया गया है। यह टर्मिनल विशेषकर आपदाओं में जब संचार के अन्य साधन विफल हो जाते हैं, वाक् संचार के लिए उपयोगी होता है। भारत के किसी भी कोने से आपातकालीन संचार के लिए इसका उपयोग किया जा सकात है। टर्मिनल के प्रेषण और अभिग्रहण आवृत्तियाँ एस-बैंड में हैं।
सुवाह्य टर्मिनल को उपग्रह चैनल के ज़रिए केंद्रीय हब स्टेशन में ईपीएबीएक्स के साथ जोड़ा जाता है और इसलिए इसे ईपीएबीएक्स का विस्तार माना जा सकता है तथा किसी भी उपग्रह टर्मिनल और ईपीएबीएक्स पर स्थानीय टेलीफ़ोन के बीच कॉल किया जा सकता है। केंद्रीय हब स्टेशन सैक, अहमदाबाद में अवस्थित है।
मौसम-विज्ञान
भारतीय मौसम-विज्ञान विभाग (आईएमडी) की इन्सैट मौसमी डेटा संसाधन प्रणाली (आईएमडीपीएस) द्वारा इन्सैट प्रणाली के मौसमी डेटा को संसाधित और प्रसारित किया जाता है। नियमित रूप से ऊपरि पवन, समुद्री सतह तापमान और वृष्टिपात सूचकांक डेटा प्राप्त किए जाते हैं। बिम्ब डेटा से व्युत्पन्न उत्पादों में शामिल है: मेघ गति सदिश, समुद्री सतह तापमान, जावक दीर्घ तरंग विकिरण और परिमाणात्मक वृष्टिपात सूचकांक। उत्पादों का उपयोग दोनों, समष्टिग्राही और संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान के लिए किया जाता है।
इन्सैट-वीएचआरआर प्रतिबिम्बों का उपयोग दूरदर्शन द्वारा समाचार कवरेज के दौरान और समाचार-पत्रों द्वारा मौसम संबंधी रिपोर्टिंग के अंश के रूप में किया जाता है। सम्प्रति, भू-स्थिर कक्षा से हिन्द महासागर के ऊपर आवृत्तिमूलक और समष्टिग्राही मौसम प्रणाली प्रेक्षण केवल इन्सैट प्रणाली से उपलब्ध है। देश के विभिन्न भागों के 90 मौसम-विज्ञान संबंधी डेटा प्रसार केंद्र (एमडीडीसी) में लगभग वास्तविक-समय में इन्सैट वीएचआरआर डेटा उपलब्ध है। संसाधित वीएचआरआर डेटा के लिए सीधे उपग्रह सेवा के प्रवर्तन सहित, एमडीडीसी प्रकार का डेटा देश के किसी भी कोने में उपलब्ध कराया जा सकता है।
देश भर में आईएमडी ने 100 मौसम-विज्ञान संबंधी डेटा संग्रहण मंच (डीसीपी) और अन्य एजेंसियों ने लगभग 200 डीसीपी संस्थापित किए हैं। अंटार्कटिका के भारतीय बेस स्टेशन शिरामाछेर में भी एक डीसीपी संस्थापित किया गया है।
डीसीपी सेवाएँ कल्पना-1 और इन्सैट-3ए के डेटा रिले ट्रान्सपॉन्डरों का उपयोग करते हुए उपलब्ध कराए जाते हैं। एक वृष्टीय मॉनीटरन प्रणाली विकसित की गई है, जो 300 बिट/सेकंड पर परिचालित होती है। इसरो ने देश में अधिक संख्या में विस्तरण के लिए किफ़ायती स्वचालित मौसम केंद्रों के देशीय विकास का कार्य संभाला है। डेटा संग्रहण को वर्तमान यादृच्छिक अभिगम विधा के बजाय टीडीएमए विधा में कार्यान्वित किए जाने का प्रस्ताव है।
निकटवर्ती चक्रवातों से आसन्न आपदा के प्रति चेतावनी के त्वरित प्रसार के लिए, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उड़िसा, पश्चिम बंगाल और गुजरात के असुरक्षित तटवर्ती इलाक़ों में विशेष रूप से परिकल्पित अभिग्राहियों को स्थापित किया गया है, ताकि इन्सैट की प्रसारण क्षमता का उपयोग करते हुए अधिकारियों और सामान्य जनता को सीधे चेतावनियों का प्रसारण कर सकें। आईएमडी के क्षेत्रीय चक्रवात चेतावनी केंद्र विशेष चेतावनी बुलेटिन जनित करते हैं और उन्हें प्रभावित क्षेत्रों को स्थानीय भाषा में प्रत्येक घंटे प्रसारित करते हैं। आईएमडी द्वारा ऐसे तीन सौ पचास अभिग्राही स्टेशन संस्थांपित किए गए हैं। इनमें से 100 उन्नत प्रोद्योगिकी के आधार पर डिजिटल सीडब्ल्यूडीएस (डीसीडब्ल्यूडीएस) हैं। प्रेषण केंद्र में पुष्टि प्राप्त करने के लिए प्राप्ति-सूचक प्रेषित्र सहित डीसीडब्ल्यूडीएस तैनात किए गए हैं।
इन्सैट द्वारा संग्रहित मौसमी चित्रों के बदले मिटियोसैट-5 से 63 डिग्री पूर्व पर मौसमी डेटा के उपयोग के लिए यूमेटसैट के साथ एक सहयोगी करार पर हस्ताक्षर किया गया है।
उपग्रह आधारित-प्राप्त खोज और बचाव
भारत, लियोसार (निम्न भू कक्षा खोज और बचाव) उपग्रह प्रणाली के ज़रिए ख़तरे की सूचना और स्थिति का पता लगाने की सेवा प्रदान करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कॉसपास-सारसैट (COSPAS-SARSAT) कार्यक्रम का सदस्य है। इस कार्यक्रम के तहत, भारत ने एक लखनऊ में और दूसरा बेंगलूर में, दो स्थानीय प्रयोक्ता टर्मिनल (एलयूटी) संस्थापित किए हैं। भारतीय अभियान नियंत्रण केंद्र (आईएनएमसीसी), इस्ट्रैक, बेंगलूर में स्थित है।
93.5 डिग्री पूर्व में अवस्थित इन्सैट-3ए 406 MHz खोज और बचाव पेलोड से सुसज्जित है जो समुद्री, हवाई और भू प्रयोक्ताओं के विपत्ति बीकनों से निकलने वाले चेतावनी सिग्नलों को ग्रहण और प्रसारित करता है। इन्सैट और जीओईएस प्रणालियाँ कॉसपास-सारसैट प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं और वे लियोसार प्रणाली के संपूरक हैं।
भारतीय एलयूटी बांग्ला देश, भूटान, माल्डीव्स, नेपाल, सेशेलेस, श्रीलंका और तंज़ानिया को ख़तरे की सूचना संबंधी सेवाएँ प्रदान करने के लिए हिन्द महासागर के विशाल क्षेत्र को आवृत करते हैं। आईएनएमसीसी/एलयूटी के प्रचालन सहभागी एजेंसियों, यथा तटरक्षक, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकारी (एएआई) और नौपरिवहन और सेवाओं के महा निदेशक द्वारा वित्तपोषित हैं।
इन्सैट जियोसार स्थानीय प्रयोक्ता टर्मिनल (जीईओ एलयूटी) इस्ट्रैक, बेंगलूर में स्थापित और आईएनएमसीसी के साथ एकीकृत है। आईएनएमसीसी में पता लगाए गए भारतीय सेवा क्षेत्र से संबंधित संकट चेतावनी संदेशों को भारतीय तटरक्षक और मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नै में बचाव सहयोग केंद्रों को प्रेषित किए जाते हैं। खोज और बचाव गतिविधियाँ तटरक्षक, नौसेना और वायुसेना द्वारा संपन्न किए जाते हैं। आईएनएमसीसी वैमानिक नियत दूरसंचार नेटवर्क (एएफ़टीएन) के माध्यम से आरसीसी और अन्य अंतर्राष्ट्रीय एमसीसी से संयोजित होता है। भारतीय एलयूटी और एमसीसी रात-दिन सेवा प्रदान करते हैं और भारतीय जहाज़ों और विमानों में सुसज्जित सभी 406 MHz पंजीकृत बीकनों के डेटाबेसों का अनुरक्षण करते हैं।
स्वदेशी खोज और बचाव बीकनों का विकास पूरा हो चुका है और अब वे योग्यता चरण में हैं। शीघ्र ही उन्हें भारतीय मछुआरों के समुदायों को जारी किया जाएगा।
यथा दिनांक, भारत में लगभग 400 पंजीकृत प्रयोक्ता एजेंसियाँ (समुद्री और हवाई) के साथ 5200 से अधिक रेडियो बीकनों में हैं।
लियोसार और जियोसार से मियोसार प्रणाली को स्थानांतरगमन का काम शुरू किया गया है। आगामी मियोसार प्रणाली की डिज़ाइन तैयार है और 2 वर्षों में इसे कार्यान्वित किया जाएगा।
उपग्रह नौसंचालन
गगन
नागरिक विमानन मंत्रालय ने उपग्रह-आधारित संचार, नौसंचालन और नागरिक विमानन के लिए निगरानी (सीएनएस)/हवाई यातायात प्रबंधन (एटीएम) योजना के भाग के रूप में एक स्वदेशी उपग्रह-आधारित क्षेत्रीय जीपीएस संवर्धन प्रणाली के कार्यान्वयन का निर्णय लिया है, जो अंतरिक्ष-आधारित संवर्धन प्रणाली (एसबीएएस) के रूप में भी जाना जाता है। भारतीय एसबीएएस प्रणाली को गगनपरिवर्णी शब्द दिया गया है - यानी जीपीएसतथाजीईओसंवर्धित नौसंचालन। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) और इसरो द्वारा संकल्पना के प्रमाण स्वरूप भारतीय वायुक्षेत्र पर प्रौद्योगिकी प्रदर्शन प्रणाली (टीडीएस) के कार्यान्वयन सहित उपग्रह नौसंचालन के लिए संयुक्त रूप से राष्ट्रीय योजना तैयार की गई है। 2007 के दौरान आठ भारतीय हवाई अड्डों पर भारतीय रेफ़रेन्स स्टेशन (आईएनआरईएस) के संस्थापन और बेंगलूर के समीप अवस्थित मास्टर कंट्रोल सेंटर (एमसीसी) से उसके संयोजन द्वारा टीडीएस सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।
पीसैट (प्राथमिक प्रणाली स्वीकृति जाँच ) का संचालन गगन में अगली प्रमुख उपलब्धि रही, जिसे दिसम्बर 2010 में सफलतापूर्वक पूरा किया गया । जीसैट-8 द्वारा भेजे जानेवाले प्रथम नौवहन नीतभार को 2011, की द्वितीय तिमाही के दौरान प्रमोचित करने का लक्ष्य है। 2012 की प्रथम तिमाही के दौरान, जीसैट-10 द्वारा दूसरे नीतभार के प्रमोचन की योजना है । एक अन्य जीयो उपगह द्वारा तीसरे गगन नीतभार की योजना बनाई गई है।
आपदा प्रबंधन सहायता (डीएमएस) कार्यक्रम
इसरो का आपदा प्रबंधन सहायता (डीएमएस) कार्यक्रम, देश में विपत्तियों के कुशल प्रबंधन के प्रति, हवाई-अंतरिक्ष प्रणालियों से, दोनों प्रतिबिम्बन और संचार को सामयिक सहायताता और सेवा प्रदान करती है। डीएमएस कार्यक्रम बाढ़, चक्रवात, सूखा, दावाग्नि, भू-स्खलन और भूकंप जैसे विपत्तियों में समाधान प्रस्तुत करती है। इनमें शामिल है जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए सुगम डिजिटल डेटा बेस तैयार करना, नुकसान का आकलन आदि, उपग्रह और हवाई डेटा का उपयोग करते हुए प्रमुख प्राकृतिक विपदाओं का मॉनिटरन, निर्णय सहायता के ले समुचित तकनीक और साधनों का विकास, उपग्रह आधारित विश्वसनीय संचार नेटवर्क स्थापित करना, आपातकालीन संचार उपकरणों की तैनाती और विपत्तियों की शीघ्र चेतावनी के प्रति अनुसंधान और विकास।
वास्तविक समय में, देश के लिए विपत्ति के पूरे चक्र के सहायतातार्थ/आपातकालीन प्रबंधन के लिए, आपातकालीन प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस (एनडीईएम), जीआईएस आधारित डेटा के भंडार के माध्यम से डेटाबेस निर्माण का समाधान किया जाता है। एनडीईएम में कोर डेटा, जोखिम-विशिष्ट डेटा, और स्थानिक और साथ ही, अस्थानिक गतिक डेटा परिकल्पित है।
देश के बाढ़-पीड़ित नदी की घाटियों के लिए हवाई एएलटीएम-डीसी डेटा अभिग्रहण कार्यान्वित किया जा रहा है। सी बैंड डीएमएसएआर के उड़ान मॉडल का विकास समाप्त होने जा रहा है। डीएमएसएआर के विकास मॉडल का उपयोग करते हुए चयनित घाटियों पर एसएआर डेटा का अभिग्रहण किया गया। आपदा प्रबंधन गतिविधियों के लिए आपातकालीन संचार उपलब्ध कराने के प्रति, गृह मंत्रालय (एमएचए) के आदेश पर, इसरो ने गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय नियंत्रण कक्ष को एनआरएससी के डीएमएस-डीएससी, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एजेंसियों, दिल्ली के प्रमुख सरकारी कार्यालयों और 22 बहु-संकट पीड़ित राज्यों के नियंत्रण कक्षों के साथ जोड़ते हुए उपग्रह आधारित आभासी निजी नेटवर्क (वीपीएन) को स्थापित किया है। इसके अलावा इसरो ने इन्सैट टाइप-डी टर्मिनल (सुवाह्य उपग्रह फ़ोन), मछुआरों के लिए इन्सैट आधारित ख़तरे की चेतावनी देने वाला प्रेषित्र (डीएटी), चक्रवात चेतावनी प्रसार प्रणाली (सीडब्ल्यूसीएस) और आपदा गुस्त क्षेत्रों में डीटीएच आधारित डिजिटल विपत्ति सूचना प्रणाली (डीडीडब्ल्यूएस) को विकसित और स्थापित किया है।
सुदूर संवेदक अनुप्रयोगों के लिए डीएमएस को अनुसंधान और विकास समर्थन के भाग के रूप में, ऊष्णकटिबंधीय चक्रवात तीव्रता अनुरेखन और भू-स्खलन पूर्वानुमान, भूकंप अग्रगामी अध्ययन, तटवर्ती भेद्यता मानचित्रण और भू-स्खलन की पूर्व चेतावनी पर कार्य कार्यान्वित किए जा रहे हैं।
डीएमएस कार्यक्रम डेटा और सूचना को बाँटते हुए कई अंतर्राष्ट्रीय पहल को भी समर्थन दे रहा है। अंतर्राष्ट्रीय घोषणा-पत्र “अंतरिक्ष और प्रमुख आपदाएँ” और एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र में आपदा प्रबंधन गतिविधियों के समर्थन के लिए सेन्टिनल एशिया (एसए) की पहल के माध्यम से, इसरो प्रमुख आपदाओं के दौरान उपयोगार्थ आईआरएस डेटासेट और अन्य सूचना उपलब्ध करा रहा है।
ग्रामीण संसाधन केंद्र (वीआरसी) कार्यक्रम
ग्रामीण जनता को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित सेवाएँ सीधे उपलब्ध कराने के लिए, इसरो ने प्रतिष्ठित ग़ैर सरकारी संगठनों/ न्यासों और राज्य/केंद्रीय एजेंसियों के सहयोग से ग्रामीण संसाधन केंद्र (वीआरसी) कार्यक्रम प्रवर्तित किए हैं।
22 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों में 473 वीआरसी स्थापित किए गए हैं, यथा आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, दिल्ली, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, नागालैंड, उड़िसा, पुदुचेरी, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह।
वीआरसी कृषि विश्वविद्यालय, कौशल विकास संस्थान और अस्पतालों जैसे ज्ञान/विशेषज्ञ केंद्रों से जुड़े हैं। वीआरसी द्वारा कृषि/बागवानी, मात्स्यिकी, मवेशी, जल संसाधन, दूर-स्वास्थ्य देखरेख, जागरूकता कार्यक्रम, महिला सशक्तिकरण, अनुपूरक शिक्षा, कंप्यूटर साक्षरता, व्यष्टि ऋण, व्यष्टि वित्त, कारीगर विकास/आजीविका सहाय के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि क्षेत्रों में लगभग 6500 कार्यक्रम संचालित किए गए हैं। अब तक, लगभग पाँच लाख से अधिक लोगों ने वीआरसी सेवाओं का लाभ उठाया है।